Wednesday, May 22, 2019

आख़िरी कॉल.। (भाग -1)



आख़िरी कॉल (भाग -1)


फोन रिंग हो रहा था, और उसकी धड़कन जैसे बैठी जा रही थी.! मन ही मन सोच रहा था, के क्या ये आख़िरी बात होगी उससे.? क्या वो फ़ोन रिसीव करेगी.? या फ़िर पिछले दर्जनों फ़ोन कॉल्स की तरह ये भी इग्नोर किया जाएगा.! तमाम बातें उसे अंदर ही अंदर तोड़ रही थी, लेक़िन था वो बेहद ही मज़बूत।
दसियों रिंग्स के बाद फ़ोन वाइब्रेट हुआ एक झटके के बाद उसने खुद को संभाला; फ़ोन रिसीव हो चुका था।
     सामने से आवाज़ आई "हलो"
हमेशा की तरह आज, "बोलो बाबू" से शुरुआत नहीं हुई थी.। ये सुनकर लगभग बिखर गया वो.; लेक़िन ख़ुदको समेटने की कोशिशें करने लगा। फ़ोन के डिस्प्ले से होती हुई दो पतली सी लेक़िन तीव्र धाराएँ माइक्रोफोन के पास निचले कोने पर संगम बना रही थी, और वो बोलने का असफ़ल प्रयत्न किये जा रहा था।
     सामने से अब भी आवाज़ें आ रही थीं.; "हल्लो"  "बोलते क्यूँ नहीं??" "मुँह में आवाज नहीं बची क्या.??"  "बार बार फ़ोन कर के परेशान न करो" "एक छोटा सा का
म क्या बोल दिया सारा प्यार फ़ीका पड़ गया" "क्या हुए वो वायदे..?"

औऱ वो आज अपनी बेज़ुबानी का  कोई कारण भी नहीं बता पा रहा था.! बस निरन्तर बह रही अश्रुधाराओं को मूँछो के आस-पास से हटा रहा था, "गर्मियों में रोने से ये फायदा है कि आँसू पसीने में मिश्रित हो जाते हैं औऱ अचानक किसी के आजाने या देख लेने का भय नहीं रहता.।"
अंततः कैसे भी रुँधे हुए गले को झाड़कर थोडी सावधानी से बोला, "कल से फ़ोन क्यूँ नहीं उठा रहे हो.?? ये आप क्या कर रहे हो सोना.?? क्या अपने रिश्ते को जिंदा रखने के लिए ये अदना सा एक जवाब जरूरी है.??"
बीच - बीच में थक भी रहा था वो, एक - एक शब्द भारी हुए जा रहे थे उसके लिये.! लेक़िन फ़िर ये सोचकर कि उसकी ज़िंदगी का सवाल है, उसके ख़ुशी के लिये खुद को अंदर ही अंदर मार रहा था वो। कैसे भी कर के अपने हिस्से के सवाल पूछ लिए उसने, औऱ फ़िर हमेशा की तरह उस  के लम्बे से जवाब के लिए माइक म्यूट कर के सुनने लगा था.; "वो क्या है कि उसे सुनते रहना अच्छा लगता था न..!"
लेक़िन उसकी आशाओं के विपरीत इस बार एक रूखा सा औऱ कुछ ज़्यादा ही छोटा जवाब मिला, "हमारे बीच बात करने को अब कुछ बचा भी है क्या..??"
.........;
वो स्तब्ध सा बस एकटक सामने वाली दीवार को निहार रहा था, जैसे दीवार के उसपार कुछ छूटा जा रहा हो उसका.। कुछ देर तक फ़ोन लगभग चुप सा रह गया औऱ फिर एक बीप के बाद फ़ोन कट गया..;

वो फ़िर से रो रहा था, लेक़िन मैं जानता हूँ, "बेहद मजबूत है वो.!"


©

✍️ आदित्य प्रकाश पाण्डेय

Saturday, May 4, 2019

कहानी : द क्वीन ऑफ़ चेस "लेखक: योगी अनुराग"



कहानी : द क्वीन ऑफ़ चेस

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उसका नाम रहने ही दीजिए न, नाम बताना जरूरी है क्या? “क्वीन” काफ़ी नहीं!

बहरहाल, उसका नाम था : गुंजन।

बड़ी बड़ी काली सफ़ेद गोटियों-सी आखें, चौकोर सा कोमल मुख, आक्रामक भाव-भंगिमाएँ और ढेर सारी बातें। कुलमिला कर ठीक वैसी ही थी मानो संगमरमर के शतरंज की “क्वीन” उठ कर मानव रूप में आ गयी हो!

लड़के के कॉलेज से चार सौ मीटर दूर वाणिज्य संकाय था, माने कॉमर्स फ़ैकल्टी। उस कॉलेज के द्वितीय वर्ष में पढ़ती थी इस कहानी की नायिका “गुंजन”, अव्वल दर्जे की शतरंज खिलाड़ी थी। शायद पूरे विवि की लड़कियों में सर्वश्रेष्ठ!

किंतु गुंजन ने कभी ये न देखा था कि कोई खिलाड़ी अपने कई मोहरे सिर्फ़ आक्रमण की पंक्तियाँ खोलने के लिए मुफ़्त में दे सकता है और अंततः जीत लेता है। कुछ इस तरह लड़के की उस लड़की से भेंट, विवि की शतरंज प्रतियोगिता में हुयी थी। प्रतियोगिता के नॉकआउट राउंड्स में लड़का भी चयनित हुआ और लड़की भी!

ये बात 2011 की है, उन दिनों की, जब वो लड़का मात्र साढ़े सोलह बरस का था!

वो एक प्रतिष्ठित विवि में स्नातक का छात्र, कुलजमा एक माह पहले ही प्रवेश लिया था। अगस्त के मानसून का समय था, जब एसवीएम के वातावरण से निकला पाँच फ़ीट का एक लड़का स्वयं को कॉलेज में ढालने का अभ्यास कर रहा था।

विवि में कुल आठ कॉलेज थे। अभियंत्रिकी, तकनीकी, वाणिज्य, विज्ञान, कला, प्रबंधन, भाषा इत्यादि के भिन्न भिन्न संकायों वाली कॉलेज की बनावट आज़ादी से पूर्व की लगती थी। दीवारों पर सीमेंट नहीं, बल्कि लाल रंग का मोटा पेंट चढ़ा हुआ था, और उसी मोटे आवरण में ईंटों की आकृतियाँ काटी हुयी थीं। देखकर लगता था कि बड़ी मेहनत की है किसी मज़दूर समुदाय ने, वह भी व्यर्थ में।

भला दीवार पर पेंट के उपरांत ईंटों की आकृति बनाने का क्या प्रयोजन? उस लड़के के बालमन में इस तरह के प्रश्नों का ज़ख़ीरा रहता!

##

संसार की हर नश्वर चीज़ की भाँति, विवि की शतरंज प्रतियोगिता भी समापन की ओर थी। और एक रोज़ हर चीज़ की तरह समाप्त हो गयी। लड़के ने प्रतियोगिता में प्रथम और लड़की ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।

पुरस्कार वितरण के उपरांत गुंजन उस लड़के के करीब आयी और बोली, जानते हो, तुम्हारा नाम हमें बहुत अच्छा लगा। शैक्षिक स्तर में एक बरस सीनियर और तिस पर भी लड़की! उसके शब्द सुनकर लड़का सुन्न हो गया, बस इतना पूछ पाया, क्यों मैम?

गुंजन ने कहा, पहले किसी का नाम था अनुराग अवस्थी, तुम्हारे नाम से उसकी याद आती है। ख़ैर, लड़का उस समय नादान था, कुछ जान सका, तो बस हल्की सी मुस्कुराहट और सहमति के साथ वार्ता समाप्त की, जी मैम।

गुंजन ने बात को और बढ़ाया, कहाँ रहते हो?
“यहीं बॉयज़ हॉस्टल में रहता हूँ, मैम।”

“फ़ोन रखते हो, नम्बर क्या है?”
“नहीं मैम, फ़ोन रखना अलाउ नहीं है ना।”

“ओफ़्फ़ो, तुम तो निरे बच्चे हो, डेट ऑफ़ बर्थ क्या है?”
“छः मार्च, नाइनटीफ़ाइव और आपकी?”

“ट्वेंटी मई, नाइनटीवन है, तुमसे चार साल बड़ी हूँ।”
“जी मैम।”

“कभी मिलना या बात करना हुआ तुमसे तो क्या करेंगे हम?” ,लड़के के पास गुंजन के इस प्रश्न का कोई जवाब न था। वो आगे बोलीं, अपनी मेल आईडी तो दे दो, या हॉस्टल का वाइफ़ाई भी यूज़ नहीं करते?

और अंततोगत्वा, उसी शाम एक प्यार भरा मेल प्राप्त हुआ लड़के को। जिसमें लिखा था, डियर, तुम बहुत स्वीट हो, एकदम छोटे बच्चे जैसे, तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगा, क्या तुम मेरे साथ चेस खेलना चाहोगे? लड़के ने मेल का उत्तर दे दिया, कभी समय मिला तो ज़रूर। एक और मेल आ गया, ऐसा करो कि तुम एक फ़ोन ले लो, और जल्दी से अपना नम्बर मुझे दे दो। उत्तर वही था, नहीं ले सकता मैम, मैं छिपकर भी हॉस्टल के नियम नहीं तोड़ सकता!

"द अलकेमिस्ट" वाले "पॉलो कोएल्हो" कहते थे ना, कि जब क़ुदरत चाहती है तो हर चीज़ उन दोनों को मिलाने में लगा देती है!

वही हुआ। दो दिन बाद ही हॉस्टल में अच्छे स्तर का एक युद्ध हो गया और प्रथम वर्ष के सभी लड़कों को हॉस्टल छोड़ने का नोटिस दे दिया गया। कॉलेज के बाहर रूम लिया तो एक फ़ोन भी ले लिया। अब रूम सिर्फ़ अपना था, साझा नहीं। शतरंज हर वक़्त मेज़ पर बिछा रहता, बेड पर गिटार और माउथऑर्गन रहते।

हर सप्ताह के अंत में गुंजन की आवाज़ों की कीलें दिल में ठुक जातीं और वक़्त यूँ ही गुज़रने लगा। गुंजन कुछ कहती नहीं थी, बस उस लड़के का हालचाल पूछती, उसके बारे में टटोलती और हर पंक्ति में उसका नाम लेती!

और एक दिन वो लड़का सत्रह का हो गया। फ़ोन पर चहकते हुए बोला, मैम, कल मेरा बड्डे है, आप आएँगी ना, एक छोटी सी पार्टी है, बस मैं और आप।

ठंडी आहों के साथ बोली, “वैसे एक बात बताओ, मैं क्यों आऊँ तुम्हारे बड्डे पर?”

इस बार सब बाँध टूट गये। वो लड़का वाक़ई छोटा था, मगर जो भाव अब आ रहे थे, उनसे अपरिचित न था। बॉलीवुड मूवीज़ का गहन अध्ययन था उसके पास, और वो उस सब में दिखाय गये तथाकथित प्रेम को ही प्रेम समझता था।

पहले प्यार की बात ही निराली होती है। इतनी निराली कि “प्रेम” जैसा शब्द छू कर भी नहीं गुज़रा होता। आसमान से गिरे ओले की भाँति श्वेत और निश्कलुष होता है पहला प्रेम।

उस लड़के ने दिल के किसी गहरे भँवर से चार शब्द कहे, मानो बाँध से बंधनयुक्त जल मुक्त हुआ हो : “आई लव यू, गुंजा!”

प्रत्युत्तर में लम्बा सा भाषण सुनने को मिला, बच्चों जैसी बातें हैं अभी तुममें, तुम जानते भी हो प्यार का मतलब क्या होता है? प्यार बस एक धोखा है लड़के, बस एक धोखा। प्यार करते हो तो कहो मत, सिद्ध करो!

इस विवाद के बाद जो बातों का सिलसिला रुका, गिटार के स्वरसंघात ही समय के उलझे धागों को काटने का प्रयत्न करते और लड़के के आसपास के रूम में रहने वालों को प्रतिदिन एक नया-सा संगीत सुनने को मिलता। वो लड़का बस उन तारों को मींजने में अपना वक़्त देने लगा।

वो लड़का आज के जितना समझदार होता तो एक ख़ूबसूरत पत्र लिखता और उसमें कहता : “प्रिय गुंजा, मैं जयशंकर प्रसाद से अधिक ख़ुशनसीब हूँ, वे कहते हैं ना कि जीवन की गोधूलि में कौतूहल से तुम आए। लेकिन मैं ये नहीं कहूँगा, मैं कहूँगा कि जीवन की ऊषा में ही किरणों सी तुम हो छाई!”

लेकिन ये होना न था, तो नहीं ही हुआ। इक्कीस मई को कॉल आया, बोलीं, जानते हैं हम तुम्हारा स्वाभिमान, चाहे जो हो जाए, चाहे हमारा बड्डे हो, मगर कॉल तो करोगे नहीं। लड़के ने कहा, सॉरी मैम, भूल गया था। बोलीं, हमको न, बेवक़ूफ़ न बनाओ, सब पता है कि तुम क्या सब करते रहते हो आजकल, देवदास हो गये हो, और हाँ अब हमें मैम न कहो, गुंजा ही कहो!

लड़के ने भारीपन से कहा : “हैपी बड्डे, गुंजा!”

मगर उन्हें इतने में संतोष न था। बोलीं, मिलना है तुमसे, रूम से बाहर भी निकला करो कभी। लड़के ने कहा, मैं अपने घर आ गया हूँ मैम, कॉलेज ऑफ़ हो गये ना कल।

बातों का सिलसिला फिर चल निकला। अब बातें हफ़्ते में एक बार नहीं, बल्कि दिन में दो दो बार होने लगीं। और धीरे धीरे पुन: वही समय आ गया, विवि की शतरंज प्रतियोगिता!

और इसके बाद दो हज़ार बारह का अंत आ गया। वर्ष के अंत में लड़के की एक उपलब्धि ये रही, कि वो लखनऊ में आयोजित देश का सबसे बड़ा शतरंज टूर्नामेंट खेलने के लिए क्वालिफ़ाई कर गया और सफलतापूर्वक खेल कर भी आया। हालाँकि कोई रैंक नहीं मिली, किंतु आरंभिक स्तर पर ये एक उपलब्धि ही थी।

और दो हज़ार तेरह की शुरुआत उस लड़के की ज़िंदगी में मोहब्बत की ओस लेकर आयी। गुंजन का प्रेम बढ़ता गया और वो एक बोली, चली, तुम्हारे रूम पर चलती हूँ। लड़के ने अटकते हुए कहा, नहीं, रहने दो आप, सब गंदा पड़ा होगा, सामान बिखरा हुआ। तिस पर वो बोली, तो क्या हुआ, मैं सब ठीक कर आऊँगी। और वो रूम पर आ गयीं।

बोलीं, सुनो, पता नहीं तुम इस बात को समझते हो या नहीं, लेकिन मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ। और इतना कर कर वो लड़के से लिपट गयीं। लड़के को जनवरी में बारिश का एहसास हो रहा था। कुछ देर बाद जब बादल छँटे तो इंद्रधनुष की भाँति गुंजन की फ़रमाइश गूँजी, कोई गाना सुनाओ ना, गिटार के साथ।

लड़के के पास “ना” कहने की कोई वजह न थी, तो रंगीन भरा एक गाना गूँज उठा : “एक लड़की भीगी भागी सी...”

गाना ख़त्म न हुआ कि गुंजन ने फिर से लड़के को बाहों में ले लिया और सुबकते हुए बोली, तुम भी तो मुझे छोड़कर नहीं चले जाओगे? लड़का स्थितप्रज्ञ था, बोला, कभी नहीं। और अगर मैं ही तुम्हें छोड़कर चली गयी तो, तो मैं जी नहीं पाऊँगा गुंजा। इन पंक्तियों के बाद एक निर्विकार शांति छा गयी।

अगले ही रोज़ से लड़के के स्वभाव में नमी आ गयी थी। “सी” प्रोग्रामिंग की क्लास में, बीच से ही खड़ा हुआ और बोला, मे आई गो सर? सर ने कहा, फ़ॉर व्हाट? लड़का बोला, इट्स समथिंग अर्जेंट, सर।

और ये सब रोज़ होने लगा। होता कुछ यूँ था कि गुंजन के कॉलेज का इंटरवल लड़के से दस मिनट पहले हो जाता था। तो लड़का उन दस मिनटों को खोना नहीं चाहता था और दोनों साथ साथ लंच करते।

और एक दिन वो लड़का अठारह का हो गया। पिछले दो हफ़्ते से न तो गुंजन का कोई कॉल था और न कोई संदेश, और ना ही कॉलेज में कोई भेंट हुयी थी। अन्यमनस्क भाव से लड़के ने कॉल लगाया, फ़ोन हमेशा की भाँति स्विच ऑफ़ था।

ना कोई जन्मदिन का उत्साह और न मताधिकार मिलने का कोई उत्सव, बस गिटार के तार “इंतहा हो गयी, इंतज़ार की” गाने को संगीत का आधार देते रहे।

करीब एक हफ़्ते के बाद, वो फ़ोन पिक हुआ। उधर से एक भारी आवाज़ थी, किसी लड़के की भारी आवाज़।

“हैलो, गुंजन मैम से बात हो जाएगी?”
“कौन बोल रहे हैं?”

“जी मैं उनका जूनियर हूँ, कॉलेज में।”
“उन्हीं की क्लास में हो?”

“जी नहीं, मैं दूसरी फ़ैकल्टी का हूँ।”
“ओह, अच्छा, इसलिए जानते नहीं उनके बारे में, आठ मार्च को इस दुनिया से चली गयीं गुंजन दीदी, उनसे बात न हो सकेगी।”

कहते कहते फ़ोन के उस पार वाले लड़के का गला भर आया और इस पार वाले लड़के की आँखें। फ़ोन काट कर, निस्तेज होकर ज़मीं पर ही बैठा गया वो लड़का, मानो गुंजन के पैरों के स्पर्श वाले फ़र्श की निकटता चाहता हो, मानो जहाँ गुंजन बैठी थी, बेड के उस हिस्से पर अपना चेहरा रख कर रोना चाहता हो।

और सहसा उसने हाथ में लगे गिटार के तारों को निर्ममता से खींच दिया, मानो हथेली में तारों की धार से कोई नई लकीर निर्मित करना चाहता हो, जिसमें नाम लिखा हो : “गुंजन”।

लेकिन हथेली से कोई नाम नहीं, बस रक्त और रक्त निकला। गिटार के फेंके जाने का शोर सुनकर आसपास के मित्र आ गये और लड़के ने आँसू पोंछ कर, हथेली के घाव को दबाते हुए एक मित्र से कहा : “मैं यमुना के घाट घटिया जाना चाहता हूँ, घटिया शमशान।”

और फिर वो गिटार की धुन उस कल-कल नदी की आवाज़ के साथ रुख़सत हो गयी। बस रह गया तो शतरंज और मोहरे, जिन्हें एक बार कॉलेज के रेत में बिखर जाने पर अपनी उँगलियों से उठाया था गुंजन ने। आज भी वो लड़का उन मोहरों को अपने पास रखता है, अपने हृदय के निकट!

इति।


©

✍️  Yogi Anurag

Wednesday, December 12, 2018

"दो दीवानें" ग़ज़ल


        

               "दो दीवाने"


जमाने भर को "ख़ुदारा" क्या कोई काम नहीं?
हमारे "इश्क़" के पीछे ही पड़े रहते हैं!


जहाँ भी जाती है, लाचार ये नजरें मेरी,
कुछ नजऱ ताक में मेरी ही गड़े रहते हैं।।


कौन समझाए इन "बेदर्द बेदिमाग़ों" को,
यूँ न, हर वक्त अपनी जिद्द पे अड़े रहते हैं।।


आँधिया आती है आयेंगी, नसीबा जाने!
"दो दीवाने" हमेशा साथ खड़े रहते हैं।



✍🏻 

©आदित्य

Sunday, September 9, 2018

"हैरान मेरा अक्श"



हर वक्त मेरा "अक्श" भी हैरान रहता है..!
🤔
कैसे ये अपनी बात यूँ बेबाक कहता है...??


क्यूँ, तनिक न डिगा मार्ग से आये हजारों गम..??


दरिया के "नीर" सा है, निर्बाध बहता है..!


"कैसे ये अपनी बात यूँ बेबाक कहता है...."

✍🏻

आदित्य प्रकाश पाण्डेय


Wednesday, August 1, 2018

"अपनों जैसे गैर"



अपनों जैसे गैर!



नोट:- ये विस्तृत कहानी नहीं है बाकी के कुछ भाग अभी भी डायरी में पड़े हुए हैं!

◆◆◆◆◆◆◆◆  

ये दसवीं की वार्षिक जाँच परीक्षा का समय था।

अब धीरे-धीरे हमलोग भी बदलने लगे थे ; 
हमारी आवारगी अब जिम्मेवारियों के दबाव में आने लगी थी। आगे की जिंदगी का फ़ैसला लेना और बाकी चीजों के लिए भी अब समय देना होता था।

अगर कम शब्दों में लिखें तो, "अब हमलोग मेच्योर होने लगे थे।"

हाँ तो , जाँच परीक्षा का पहला दिन था।
12वीं की नई बिल्ड़िंग में बैठे हुए सभी पढ़ाकू लड़के-लड़कियों में अचानक हमारी एंट्री हुई। पेपर कॉपी बांटी जा चुकी थी और हमलोग पहले ही दिन लेट हो गए थे। सबलोग ऐसे देख रहे थे जैसे हंसो के बीच कुछ कौवे घुसने लगे हो।

लेकिन एक चेहरा सबसे इतर हमे करुणा की भावना से निहार रहा था, जैसे अगर उसके बस में हो तो अभी लिखी-लिखाई कॉपी हाथ मे दे दे😊

गोरे से गोल चेहरे पर दया का भाव झलक रहा था और चेहरा लाल हुआ जा रहा था।
मैं खाशा आकर्षित हुआ।
क्या पता वो पहले स्कूल आती थी या नहीं लेकिन हमने तो उन्हें पहले नहीं देखा था।
और हाँ पहली बार किसी लडक़ी के चेहरे पे नज़र रख के छोड़ दिया था🙃

खैर हल्की डांट-फटकार के बाद हमे भी कॉपी-पेपर के दर्शन हुए!

और फिर अपनी चिर - परिचित लास्ट बैंच की ओर रुख कर गए हमलोग।
        बाकी बच्चे तो ऐसे लगे थे जैसे IAS बन जाएंगे इसी लिखने से , लेकिन हम सब जानते थे ।
अरे इन्हीं कॉपीयों से रोज मुलाक़ात हो जाती थी शाह जी के भुजा वाले ठेले पर और पुल पर पकौड़ी खाते हुए।

खैर, मेरे पास तो एक वजह और मिल गई थी पेपर न लिखने की जैसे-तैसे उनको निहारते हुए मैंने भी कुछ हल्का-फुल्का लिखा.!
और जमा होने का इंतिजार करने लगा।

शायद उन्होंने भी मेरी मनोदशा को भाँप लिया था! और कभी- कभी मेरी चोर नज़र की चोरी भी पकड़ ली जाती थी, ये बात और है कि अब जाके एहसास होता है कि आखिर वो क्यूँ देखती थीं हमारी ओर।

सारा हाल उसी दिन मैंने राहुल को बता दिया; और शायद ये मैंने गलत किया।
लेकिन आखिर करता क्या वो मेरे सबसे क्लोज जो था!

अब रोज उनका मुझे देखना और मेरा उन्हें देखना इसी क्रम में चलता रहा।
आख़िर लास्ट पेपर के दिन राहुल ने ही प्लान किया कि  भाई नम्बर दे देते हैं। 
वैसे भी बोलना मेरे बस में था नहीं। तो हमने एक चिट पे नम्बर लिखा और उनकी हाई बेंच के फाँके मे दबा दिया इससे ज्यादा कुछ करने की हिम्मत नहीं हुई और हमलोग बाहर निकल आये।

एग्जाम बीत गया और स्कूल की भी छुट्टी हो गई। कुछ दिन तक ट्यूशन भी चला लेकिन अब भी उनका व्यवहार बिल्कुल वैसा हीं था। मुझे तो कभी - कभी शक़ होता था कि वो चिट इनको मिला या नहीं।

लेकिन शायद 6-7 रोज बाद शाम को मेरे फोन पे एक नए नम्बर से कॉल आया उस जमाने मे तो truecaller जैसा कुछ था नहीं और हमारे पास फोन भी ऐसे होते थे कि सामने वाला देख के मुँह बना लेता था; नोकिया 2700 क्लासिक को छप्पन जगह से चिपका के कैसे भी काम चलाना पड़ता था।

हाँ तो, फोन पे वो हीं थी उनके बोलने के लहजे से ही प्रतीत हो गया था!
पहली बार किसी लड़की के सवालों का जवाब देना था मुझ जस गँवार आदमी को।
पहले उन्होंने हिंदी में बतियाना शुरू किया लेकिन बहुत जल्दी ही भाँप गए कि मैं थोड़ा असहज महशुस कर रहा हूँ।
और फिर अपनी भोजपुरी जिंदाबाद!

कुछ तीखे सवालों का जवाब देने के बाद ही नॉर्मल बातें शुरू हुई।
और वहीं एक दूसरे को जानने समझने का दौर। बातचीत के दौरान ही मालूम हुआ कि फोन उनकी माताजी का था और उधर से मिस्ड कॉल आने पर ही कॉल बैक करना था।
पूरे 12 मिनट के लगभग बात हुई उसदिन।

फिर कभी कभी दिन में एक - दो बार बात हो जाती थी।
बोर्ड एग्जाम्स की तैयारियों की वजह से हमलोग ज्यादा ध्यान पढ़ाई में हीं दे रहे थे।

और फिर परिक्षा काफी करीब आ गई और हमारी बातचीत को हमने रोक लगा दी कुछ दिनों के लिये।

उनका सेंटर कमला राय महाविद्यालय गोपालगंज था शायद।

 परिक्षा के दौरान उन्होंने एक दो बार बात की थी बस पूछने को की पेपर कैसा गया। 

परीक्षा बीत गई और कुछ दिन की छुट्टी मिली हमें इस दौरान हमलोग काफ़ी घुल-मिल गए।

रोज बात हो जाती थी उनसे बस ऐसे ही दो महीनें गुजर गए और कुछलोग आगे की पढ़ाई के लिए गोपालगंज जाने लगे, जिनमे मैं भी था।

फिर बंजारी ब्रह्न स्थान के करीब का वो मोहल्ला और पंडित जी के मकान का वो कमरा और कुछ पुराने दोस्त, यहीं हो गई थी जिंदगी।
उस समय गोपालगंज ही ज्यादा दूर परदेश जैसा प्रतीत होता था और हर शनिवार को घर भाग जाते थे हमलोग! "खैर ये भी एक लंबी कहानी है फिर कभी लिखूँगा।"

हाँ तो मुद्दे पे आतें हैं।
बात उनसे अब भी प्रतिदिन होती थी या फिर ऐसा समझिए कि अबतक सबकुछ सही था।

वो आगे की पढ़ाई भी मिश्रा सर के यहाँ ही कर रही थी ।
और कुछ लोग और रह गए थे अपने टीम से वो भी वहीं ट्यूशन लेते थे और शायद उनका ये फैसला सही था।

मैंने Gopalganj आके जो पाया वो तो मेरी आत्मा जानती है; लेकिन जो गंवाया आप उससे परिचित हो जाएंगे इस कहानी के जरिये।

हाँ तो हमारी बातचीत ऐसी ही चलती थी फिर अचानक उनकी बातों में राहुल का जिक्र आने लगा,

"पता है आज आपके मित्र मुझे घूर रहे थे बहूत देर तक"
"पता है आज ये हो गया, वो हो गया वग़ैरह"
और मैं सभी बातोँ का बस एक ही जवाब देता था , "राहुल बहुत अच्छा लड़का है! मैं उसके बारे में गलत सोच ही नहीं सकता"

और मेरी ओर से महाशय के शान में तारीफों के पूल बांध दिए जाते थे! 
अरे मुझे क्या मालूम था कि किसी दिन इसी पूल से मेरा जिगरी दोस्त मेरी ही 💕💕 को लेकर फरार हो जाएगा🤕

और धीरे - धीरे बातें बदलने लगीं, "अब बातें मुझसे होती थी लेकिन इनके बारे में"

लेकिन मैं अब भी आने वाले खतरे से बेख़बर था । 
हाँ ये वो समय था जब मुझे गाँव से लोकल इनपुट्स द्वारा जानकारी मिलने लगी थी कि "आजकल राहूल भाई भाभी से ज्यादा ही करीब होने लगे हैं।
और मैं मूरख ये समझता था की सबकुछ मेरे वास्ते हो रहा है।

लेकिन अब धीरे धीरे उनकी बातों से लगने लगा था कि कुछ तो गड़बड़ है।
फिर उन्होंने बोला कि उनके पास फोन नहीं रहेगा कुछ दिन तक बात नहीं हो पाएगी, मेरे लिए कुछ मुश्किल था लेकिन नामुमकिन नही। मैनें भी हामी भर दी, मुझे क्या मालूम था कि ये उनसे आखिरी बातचीत है ।
उन्होंने भी एहसास तक न होने दिया कि ये रिश्ता अब टूट चुका है।

खैर लगभग 20 दिन बाद विश्वस्त सूत्रों ने जानकारी दी कि आजकल उनको राहुल बाबू घुमा रहे हैं।

सुनकर थोड़ा असहज लगा लेकिन अजीब नहीं,
बस इस बात का मलाल था कि मान लिया वो तो गैर लड़की थी जिससे मेरा कुछ दिनों से ही रिश्ता था लेकिन ये तो दोस्त था मेरा😔

हाँ इस बाबत राहुल के ओर से पहली सफ़ाई तब मिली जब हमलोग एक दोस्त के यहाँ निमंत्रण में मिश्र सोनहुला गए हुए थे।
उनकी आँखें सब बयाँ कर रहीं थी ,  मैंने भी कुछ ज्यादा कुरेदा नहीं बस बात को वहीं बन्द किया और ख़ुश देखने की तमन्ना जाहिर कर आये।

फिर इस बाबत कोई बात ही नही  हुई राहुल से।
हाँ ये बात और है कि ये लोग लगातार रिलेशनशिप में रहे।

अभी कुछ दिन पहले मालूम हुआ कि उनकी शादी हो गई है, और मेरा भाई बिन ब्याहे बिदुर हो गया😳

कूछ अफशोस और हल्का गुस्सा आता है अब।
"अगर तेरे से कुछ होना नहीं था तो फिर.......😡"

"ख़ैर कुछ भी हो भाई है तू मेरा💞"

(कहानी पूरी तरह से वास्तविकता को परोसने की कोशिश का नतीजा है; इसीलिए कुछ त्रुटियाँ मिलेंगी इसीलिए आप सभी से क्षमाप्रार्थी हुँ)

(ऐसा भी नही है कि मैं बहुत संस्कारी बच्चा हुँ!राहुल ने जो भी किया इसमे उसकी कोई गलती नहीं मानता मैं! और हाँ वास्तव में राहुल एक अच्छे दोस्त के साथ-साथ मेरा भाई भी है और मुझे गर्व है ऐसे भाई पर)

***सभी पात्र पूर्णतः काल्पनिक हैं!!

©©
✍ आदित्य प्रकाश पाण्डेय

Saturday, May 26, 2018

"किसी का नाम लो जिसको, मोहब्बत रास आई हो.!" (अंतिम भाग)



किसी का नाम लो जिसको.....

[ भाग - 8; अंतिम भाग ]

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मैंने थरथराते हाथों से उसे खोला. डर लग रहा था कि फट न जाए. लिखा था...


           “मेरे मन मंदिर के देवता! मैं आपके चरणों की दासी बनने योग्य नहीं हूँ. मेरी आराधना अभी अधूरी है. मेरी पूजा सच्ची नहीं है. तभी तो मैं आपको पा न सकी. मेरा यह जीवन अकारथ हुआ. जन्म – जन्म से आपको पाने की तपस्या इस जन्म में भी सफल न हो सकी. मैं तपस्या करती रहूँगी पर मंजिल अभी दूर है. मेरे सर्वस्व! मेरे प्रिय! मेरे पति! मैं आपकी हूँ और आपकी रहूँगी! लेकिन मैं आपका जीवन संकट में नहीं डाल सकती. आपको कुछ हो इसके पहले मैं खुद को मार डालूँगी. और यदि पापा ने अब कुछ सुना तो आपको जिन्दा नहीं छोड़ेंगे. उस दिन भी आप मिले नहीं तो बच गए. और फिर मम्मी ने मना लिया कि यदि दुबारा कुछ हो तभी कोई कदम उठायें. सो मेरी बात मानिए और यहाँ से जल्दी कहीं दूर चले जाइए. इस जनम में मिलना संभव नहीं और माता – पिता का मन दुखा कर मैं कुछ पाना भी नहीं चाहती. मेरे गले में शादी के नाम पर फांसी का फन्दा कसा जा रहा है और अगर मैंने इनकार किया तो सीधा इसका मतलब होगा आपकी मौत. मेरा शरीर दूसरे के हवाले करने की तैयारी हो चुकी है. 

अतः आपको कसम है. न आप मेरी राह में आयें, न मिलें, न कोई पत्र आदि लिखें. समझ लीजिये, मैं अब इस संसार में नहीं रही.
             सिर्फ आपकी जो आपकी न हो सकी.
                                      मधु”

            पत्र को पुनः तह करते समय मेरी एक गहरी सांस निकल गयी. मैंने पत्र और तस्वीर उन्हें वापस किया. उन्होंने दोनों चीजें लेकर फिर बटुए में रख लिया. मुझसे बोले – “सर! एक बार वो शेर दुहरा दीजिये!” मैं कुछ कहने सुनने की स्थिति में नहीं था. मैंने पूछा  – “कौन सा?” 


           “वही... किसी का नाम लो...”


           मैंने भारी मन से दुहरा दिया –


            “मैं मान लूंगा कि मुझमें कमी रही होगी,

मगर,
    किसी का नाम लो जिसको मुहब्बत रास आयी हो!”


           पर यदि उन्होंने मुझसे मेरे मन का कोई मेरा शेर कहने को कहा होता तो शायद मैं कहता -            "खुदा की इतनी बड़ी कायनात में मैंने,
           सिर्फ एक शख्स को माँगा, मुझे वही न मिला!"


           पर मैंने कहा नहीं.!


           उन्होंने अपनी आँखें पोछीं और पुछा – “कब पोस्ट करेंगे इसे?” 
           जी में आया कहूं – “मैं तो सिर्फ कहानियाँ लिखता हूँ दोस्त. तुमने तो इसे जिया है.” 

पर मेरे मुंह से निकला – “देखते हैं”.
..................................................             ..................................................



[ कहानी पूर्णतः काल्पनिक है और किसी भी व्यक्ति के जीवन से इसकी घटनाओं का मिलना मात्र एक संयोग है. ]


©©


Friday, May 25, 2018

"किसी का नाम लो जिसको, मोहब्बत रास आई हो.!" भाग :- 7



किसी का नाम लो जिसको...


[ भाग - 7 ]

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क्या वह बेवफा निकली?


           कुछ दिन बाद कॉलेज में मेरे नाम डाक से एक पत्र आया. अनुमान से भी और राइटिंग से भी लग गया कि यह मधु का ही पत्र है. सोचा जैसे का तैसा उसे वापस कर दूं. पर दिल के हाथों बेबस था. कुर्सी पर बैठा. चपरासी से एक गिलास पानी मांग कर पिया. ख़त खोल कर पढने लगा. 


           मधु ने अपना दिल खोल कर रख दिया था.
           अब मेरा मन बिलकुल नहीं लग रहा था. हर ओर एक उदासी के सिवा कुछ भी न था.
           कुछ दिन बाद पता चला उसकी शादी किसी इंजीनियर से तय कर दी गयी है. बोर्ड परीक्षाओं से पहले ही एक बड़े से मैरेज हॉउस में उसकी शादी हो गयी. मैं एक पागल की मनःस्थिति में आ गया था. क्लास लेते लेते मैं भूल जाता कि मैं क्या पढ़ा रहा था. खुद पर तरस आ रहा था. 
           कुछ दिनों बाद मधु फिर कालेज आने लगी थी. पर अब मैं क्लास में भी उसकी ओर देखने की हिम्मत नहीं कर पाता  था. वह भी किसी पेरे गए गन्ने की तरह लगती. अगर कभी हमारी निगाहें मिल भी जातीं तो हम विवश इधर उधर देखने लगते. और फिर हमें अपनी आँखें पोंछनी पडतीं.
           किस्मत ने चोट तो बहुत गहरी दी थी, पर शायद उसे कुछ रहम भी आ गया. शुरू में जो कुछ अर्जियां और इंटरव्यू दिए थे उनमे एक केमिस्ट के पोस्ट के लिए मेरा चुनाव हुआ था, पर रिजल्ट किसी आरक्षण के मुकदमें के चलते लंबित था. अब उसका रिजल्ट निकला था और मैं सेलेक्ट हो गया था. मैंने इस्तीफा देना चाहा तो प्रिंसिपल ने सेशन की बात कहते हुये इस्तीफा वापस कर दिया. पर अब मैं वहाँ नहीं रुक सकता था.
           सबने मुझे फेयरवेल दिया. सभी उदास थे. वे अध्यापक महोदय भी जिन्होंने उसका ख़त बरामद कराया था. अंत में मुझसे कुछ कहने को कहा गया. पर मैं कुछ बोल नहीं पाया.  मेरा गला रुंध गया और फिर चारो ओर सिसकी सी गूँज उठी. मैंने अपना बोरिया बिस्तर समेटा और यहाँ ज्वाइन कर लिया. आते समय मैंने मधु को देखा था. उसने उस दिन वही साड़ी पहनी थी, जो पहन कर वह होटल में आयी थी.
         
 बस. यही थी मेरी कहानी. आप इसे चाहे जैसे सजाएं-सवारें पर बस हम दोनों का असली नाम न दें|


           "और आपका परिवार?" मैंने जिज्ञासा की.


           "तीन दिनों में जो लगभग सोलह घंटे उसके साथ बिताये, वे इस ज़िन्दगी के लिए काफी हैं सर! मैं जो प्रेम प्याला पी चुका अब उसके बराबर का कोई मिलने से रहा. दुबारा ज़िंदगी मिलती है या नहीं कौन जाने? पर इस ज़िंदगी में तो मेरे लिए वे सोलह घंटे काफी हैं."
          

 पार्क में अँधेरा और सन्नाटा दोनों पसर चुका था. उन्होंने फिर एक सिगरेट जलाई. मैंने तीली की रोशनी में देखा उनकी आँखों में कुछ तारे झिलमिला रहे थे. कश खींच कर उन्होंने अपना पर्स निकाला और एक सात बाई दस सेमी की तस्वीर निकाल कर अँधेरे में ही मुझे पकड़ा दी, फिर एक अंतर्देशी पत्र भी. पर वहां इसे देखना पढना संभव नहीं था. हम पार्क के बीच लगी नियोन लाईट तक आये. तस्वीर देख कर मुझे भी झुरझुरी आ गयी. बेहद मासूम एक लडकी जिसकी आँखें जैसे बोल रही हों, तस्वीर से झाँक रही थी. कोई भी इसे देख कर काबू में नहीं रह पाता. मैंने अंतर्देशी उन्हें वापस करनी चाही. वे बोले – “कोई बात नहीं. पढ़ लीजिये”.
           मैंने थरथराते हाथों से उसे खोला. डर लग रहा था कि फट न जाए. लिखा था......,



अंतिम भाग यहाँ से पढ़े:-

Thursday, May 24, 2018

"किसी का नाम लो जिसको, मोहब्बत रास आई हो.!" भाग :- 6



किसी का नाम लो जिसको...


[ भाग - 6 ]

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उन्होंने मुझसे बात करने से इनकार कर दिया.


           बहुत अपमानजनक स्थिति थी. पहले सोचा रेजिग्नेशन दे दूं. पर नौकरी छोड़ना इतना आसान नहीं था. कमरे पर आ कर चक्कर काटता रहा.

             उसके पापा तक बात पहुंचे उसके पहले उन से साफ़ साफ़ कहने का मन हुआ. सोचा कि बता दूं कि मैं मधु से शादी करने को तैयार हूँ. यही मेरे हिसाब से सबसे उचित था. मधु जैसी लडकी मिल जाना भी एक किस्मत की बात थी और सबके मुंह भी बंद हो जाते. 

कपडे पहन कर निकला पर हिम्मत टूट गयी. जाने क्या सोचेंगे? बड़े लोग हैं. लेट कर परिस्थिति पर विचार कर रहा था कि आँख लग गयी.

                रात के नौ बज रहे थे. दरवाजे पर दस्तक हुई. पड़ोस वाले सज्जन थे. जल्दी से मुझे घसीटते हुये बाहर लाये, कमरे पर ताला डाला, और मुझे ले कर अपने घर में घुस गए. उनकी पत्नी कुछ पूछें इसके पहले उन्होंने उन्हें चुप रहने को कहा और बताया कि मधु के पापा कुछ लोगों के साथ मोहल्ले के बाहर नीम के नीचे अँधेरे में खड़े थे, और कह रहे थे कि उस मास्टर को जिन्दा मत छोड़ना. फिर मेरे कमरे पर कुछ लोग आये. मेरे बारे में पूछ-ताछ की. मुझे घर में छुपा कर वे सज्जन बाहर निकले और बताया कि मास्साब तो शाम को ही गाँव चले गए.
           
कुछ अता-पता ? 
           नहीं साहब. हमें किसी के गाँव घर से क्या लेना? पर आयेंगे ही. आप फिर आ जाइएगा. 
           बच कर निकल गया साला.
           मैं सुन रहा था. 
           आवाजें शांत हो गयीं.
           दो चार दिन तक मेरे कॉलेज के कुछ टीचर्स और अन्य लोगों ने प्रयास कर के मामले को ठंढा कर दिया. मैं फिर कॉलेज जाने लगा. पर मधु का स्कूल आना बंद था. मुझे लगता कि सबकी आँखें मुझपर ही टिकी हैं. लगता कि क्लास में स्टूडेंट्स सर झुकाए मुझ पर मुस्कुरा रहे हैं.
           कुछ दिनों बाद मधु भी कॉलेज आने लगी. उसका रंग उतर गया था. जैसे किसी लम्बी बीमारी से उठने के बाद होता है, 

वैसे, दिन में तो समय कट जाता था पर रात बहुत भारी पड़ती थी. ज़िंदगी में पहली बार प्यार किया, और वह एक गहरा दर्द दे गया. लगता कि ज़िंदगी लुट गयी है. बस गम था. बेइन्तेहाँ गम. 

                एक दिन रात को मैंने दिल उड़ेल कर एक लंबा ख़त लिखा. अब प्रतीक्षा नहीं हो पा रही थी. उसकी टास्क की कॉपी में रख कर उसे आपने हाथ से दिया.
           लैब में आ कर बैठा ही था कि पीछे से मधु आ गयी. मेरा ख़त उसने कांपते हाथों से मुझे पकड़ाया और तेज़ कदमों से लौट गयी. मन में जोर से कसक उठी. 

क्या वह बेवफा निकली???


भाग :- 7

Wednesday, May 23, 2018

"किसी का नाम लो जिसको, मोहब्बत रास आई हो" भाग :- 5




किसी का नाम लो जिसको....


[ भाग - 5 ]

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सब सो रहे हैं पर मैं तब से बैठी हूँ. हेलो! आप ही हैं न सर! हेलो!”


           मेरे जिस्म में एक सुरसुरी दौड़ रही थी. मैंने होटल के कार्ड से पता बताया. 
           “आप वेट कीजिये सर! मैं अभी पहुँचती हूँ.” 
           मैंने फ़ोन काटा, पैसे दिये और किस्मत को धन्यवाद देते हुये होटल लौट आया.


           पौन घंटे बाद मेरे कमरे के दरवाजे पर नॉक हुई. जो लडकी अन्दर आयी वह वह मधु नहीं थी जो मेरे क्लास में पढ़ती थी या जिसे मैं ट्यूशन पढाता था, या जिसे मैं जानता था. 

यह कोई दूसरी ही मधु थी. सजी – संवरी. मैंने उसे अब तक सलवार सूट में ही देखा था. आज उसने कामदार साड़ी पहनी थी. वह बड़ी लग रही थी, भव्य लग रही थी, सुन्दर तो बहुत लग रही थी. अन्दर आकर उसने कमरा अन्दर से बंद कर दिया.
           वह खिली – खिली थी और मन-मगन. पहली बार हम एकांत में मिले थे. उसके पास बहुत सी बातें थी. मैं चुप चाप सुन रहा था और उसे देख रहा था. उसने बताया कि वह इवनिंग शो का बोल कर आयी है. हमारे पास दस बजे तक का समय था.


           मैंने चाय मंगाई. चाय पी कर वह बिस्तर पर लेट गयी, निःसंकोच. वह एक तने हुये धनुष की तरह लग रही थी. उसके नेत्रों में बेपनाह आमंत्रण थे. किन्तु वे आमंत्रण नितांत सहज थे. मैं अपराध बोध महसूस कर रहा था. मैं खुद को उससे कमजोर महसूस कर रहा था. 

पहले मेरा विचार था कि कमरे में ही वक़्त बिताया जाए, किन्तु अब मुझे बाहर निकलना ही उचित लगा.
           हम बाहर आये. एक अनबूझ प्यास से गला सूख रहा था. मैंने कोकाकोला पीने का प्रस्ताव रक्खा. दो - दो बोतल पीने के बाद कुछ प्यास कम हुई. मैं आशंकित था किन्तु वह एकदम सहज थी. मुझे लगा, वह जाने क्या सोच रही होगी मेरे बारे में. 

एक रिक्शा कर के हम हजरतगंज पहुंचे. हम साढ़े नौ बजे तक खूब घूमे. खूब बातें कीं. मेरे लिए वह एक ज़िंदगी का शानदार दिन था. कम से कम उस दिन मुझे यही लगा था.
           मैं तीन दिन वहाँ रहा. वह तीन दिनों तक रोज आती रही. और इन तीन दिनों में हमने एक दूसरे को पूरी तरह पा लिया.  
           स्कूल खुले तो वह सेकंड ईअर में आ गयी थी. और हम पहले से अधिक खुल गए थे. वह अकसर लैब में आ जाती. हम बातें करते रहते. 

पर यह लोगों की नज़र में आ गया था. एक दिन मैं लैब में नहीं था. उसने मेज की दराज में एक लंबा सा ख़त डाल दिया और चली गयी. लैब बॉय एक नया छोकरा था जो बेहद शातिर था. उसने स्टाफ रूम में आ कर सबको बता दिया. सबको सांप सूंघ गया. वहाँ वह अध्यापक महोदय भी थे, जो मधु को पहले ट्यूशन पढ़ाते थे. वे सीधे प्रिंसिपल के पास पहुंचे, और प्रिंसिपल, वाइस प्रिंसिपल के साथ जा कर लैब के मेज की दराज से ख़त बरामद करा दिया. 

मैं क्लास ले रहा था. मेरे पुराने चपरासी ने आकर बताया. मैं लैब की ओर भागा. पर बात हाथ से निकल चुकी थी. मैं देर तक सन्नाटे में रहा. फिर मैंने प्रिंसिपल से बात करनी चाही. उन्होंने मुझसे बात करने से इनकार कर दिया...;




भाग :- 6

"किसी का नाम लो जिसको, मोहब्बत रास आई हो" भाग:- 4



किसी का नाम लो जिसको...


[ भाग - 4 ]

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बाद में उनकी नाराजगी भारी भी पडी....


           मधु व्यवहारकुशल भी थी. बहुत अच्छी. मेरी खूब खातिर करती. जाड़ों में स्वेटर बुन दिया. उनकी माँ भी बहुत आदर देतीं. शायद वे अपनी बेटी का मन भांप चुकी थीं. पर उसके पापा ठंढे ही बने रहे. शायद मेरे पहले इनकार को वे अपना अपमान मान कर खिंचे बैठे थे.
           कॉलेज में वार्षिक खेल कूद हुये. टीचर्स भी हिस्सा ले रहे थे. बैडमिंटन का फ़ाइनल था. टीचर्स की ओर से मैं था. स्टूडेंट्स की ओर से कालेज का चैम्पियन. मेरी तबियत कुछ खराब थी. मैं पहला सेट हार गया. मैंने देखा, मेरी हार मधु के चेहरे पर पुती ही नहीं थी, आँखों में भी झिलमिला रही थी. उसका चेहरा देखते ही कुछ हिल सा गया भीतर. मैं चैलेंजिंग मूड में आ गया. पता नहीं कहाँ से मुझमें ताकत आ गयी. मैंने दूसरे सेट पीट लिया.
           तीसरे सेट में जब शटल आख़िरी बार प्रतिद्वन्दी के कोर्ट में गिरी, तालियों से मैदान गूँज उठा और मधु ऐसे भाग कर आयी जैसे लिपट जायेगी. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं.
           एक्जाम ख़तम हो गए. मैं पर्चों के बाबत पूछने के बहाने उसके घर गया. देखा – किसी सफ़र की तैयारियां हो रही हैं. मधु गर्मियों में अपने मामा के यहाँ लखनऊ जा रही थी. उसने मौका देख कर एक पुर्जा मुझे पकडाया. 

मैंने घर आ कर पढ़ा. लिखा था – “अगर संभव हो तो आइयेगा. वहाँ बहुत से लोग हैं और बंदिशें भी नहीं. फ़ोन कर के काट दीजियेगा. तीन बार ऐसा करने से मैं समझ जाऊंगी, फिर मैं ही उठाऊंगी”.
           आखिर में एक नंबर लिखा था...!


           बोर्ड एक्जाम, फिर उनके कापियों की जांच आदि ख़तम होने पर मेरी भी छुट्टी हुई तो मैं अपना बोरिया बिस्तर समेट अपने गाँव चला गया पर मन कहीं छूट गया था. दो चार दिन तो कटे. एक दिन घर पर एक निमंत्रण आया जिसमे शादी की कोई डेट पडी थी. मैंने उसी डेट को एक दोस्त की शादी का बहाना बनाया, और लखनऊ जा पहुंचा. मैं कभी लखनऊ नहीं गया था. न ही मेरा कोई परिचित था वहाँ. एक होटल में कमरा लिया. नहा धो कर चाय पी. सिगरेट सुलगाई और नीचे उतर आया. एक पी सी ओ से नंबर ट्राई किया. वैसे ही जैसे उसने कहा था. चौथी बार उम्मीद थी कि वही उठायेगी तो नहीं काटा फोन. 

पर उम्मीद के खिलाफ किसी और ने फोन उठाया. मेरी आवाज जैसे हलक में फंस गयी. मैंने फ़ोन काटा. होटल आया. मैं निराश था. होटल के बेड पर सोचते सोचते मुझे नींद आ गयी. नींद खुली तो तीन बज रहे थे. लगा आना बेकार हुआ. पर लौटने के पहले एक बार और तकदीर आजमाने का फैसला किया. 


           इस बार मैं फोन काटूं इसके पहले ही उठा लिया गया.
“हेलो सर! सॉरी सर! मुझे उम्मीद नहीं थी तो मैं जरा एक सहेली के यहाँ चली गयी थी. लौटी तो पता चला कि किसी के ब्लेंक कॉल आ रहे थे. सब सो रहे हैं पर मैं तब से बैठी हूँ. हेलो! आप ही हैं न सर! हेलो!”


भाग :- 5

Tuesday, May 22, 2018

"किसी का नाम लो जिसको, मोहब्बत रास आई हो" भाग:- 3


किसी का नाम लो जिसको...


[ भाग - 3 ]
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रोज का तमाशा हो गया....


           एक दिन जब कापियां जांचने को मंगवाईं.,

जाने क्यों पहले उसी की कापी देखने का जी किया. कॉपी खोज कर निकाली. 

                         कॉपी बहुत सुन्दर से सजी थी. पहले पन्ने पर मैंने कभी पहले ध्यान नहीं दिया था, पर एक शंख के पीछे से निकले एक कमल की सुन्दर चित्रकारी थी और कलात्मक अक्षरों में लिखा था “मधु”. 

                   मैंने पृष्ठ पलटा. आख़िरी पृष्ठ पर जहां मैं दस्तखत करता, वहाँ एक तह किया कागज़ रखा था. मैंने खोला और पढ़ने लगा – 

पेन्सिल से लिखा था – "आप इस तरह मुझे रोज क्लास में खडा करेंगे तो मैं पढाई छोड़ दूंगी."

           मुझमें सिहरन भर गयी. अजीब सा नशा छा गया. देर तक सोचता रहा. क्या करूं ? क्या लिखूं? मन करता था कि एक लम्बा सा पत्र लिख दूं. पर जब्त किया. 

उसी कागज़ पर लिखा – “आपको पढाई में मन लगाना चाहिए!” कागज़ वहीं रख कर कॉपी बंद कर दी. सारी कापियां जांचने के लिए कमरे पर उठा ले गया. दूसरे दिन क्लास में सबको खुद ले जाकर बांटी, ताकि स्लिप ठिकाने पर बिना किसी खतरे के पहुँच जाए.
           दूसरे दिन लैब में वो प्रेक्टिकल की कॉपी मेरी टेबल पर रख कर चली गयी. खोल कर देखा – एक पृष्ठ तह किया हुआ. 

लिखा था – “आप ही बताइये क्या करें? किसी की छवि आँखों में बस गयी है. किताब में अक्षर की जगह किसी की सूरत दिखती है. नींद आती नहीं. कौर निगला नहीं जाता. मैं मन मंदिर में जिसकी आरती उतारती हूँ उसे मुझ पर दया नहीं आती. मुझे जला कर उसे अच्छा लगता है. ठीक है. मेरी किस्मत में जलना है, तो जलेंगे. उफ़ तक न करेंगे. उसे मेरी कदर होगी पर मेरे न रहने पर.”
           मैं पागल सा हो गया. हर लफ्ज जैसेे सुई चुभा रहा था. मन मसोसने सा लगा. मैंने फिर एक लंबा ख़त लिखने की सोची, पर फिर जब्त कर गया. उसी कागज़ पर बस एक पंक्ति लिखी – “जलाने वाला पहले खुद जलता है, तभी किसी को जला पाता है”.
           कापियों के बीच ख़त आते जाते रहे. आज कल जैसे स्मार्ट फोन का ज़माना तो था नहीं. व्हाट्स एप, मेसेंजर, कुछ नहीं.

(मैंने महसूस किया है कि आज कल तो फेसबुक के पोस्ट भी प्रेमपत्र की भूमिका निभाने लगे हैं. लड़की को पता है कि दरअसल यह पोस्ट उसके लिए है, बाकी लोग वाह वाह कर रहे हैं. फिर उसने भी एक पोस्ट डाल दी, तो लड़के को भी पता है कि जवाब आ गया. और कुछ नहीं तो इनबॉक्स तो है ही. फोन करने की जरूरत नहीं. चिट्ठी इधर लिखी गयी, उधर बिना खतरे के डिलीवर हो गयी. तब यह सब नहीं था. वो चोंगे वाला फोन था. कभी फोन करो तो पहले सौ सवाल. आप कौन? किससे बात करनी है? क्या काम है? वेट करिए. फिर हाँ - हूँ- ठीक है, अच्छा. और लगता जैसे चोरी कर रहे हैं. पी सी ओ के बाहर दस लोग अपनी बारी के लिए खड़े रहते, बाहर निकलने पर यूं देखते जैसे नंगा कर देंगे.)

दूसरों को देख कर ही मैं इन चोंचलों में नहीं पड़ा. बस किताबें और कापियां ही डाकिया बनती रहीं. अकेले में मिलने की तो कोई सूरत ही नहीं थी. अब पढ़ाने में मेरा मन नहीं लगता था. मुझे अफ़सोस हुआ कि उसे घर पर ट्यूशन पढ़ाने की बात से मैंने इनकार क्यों किया. ऊपर से गज़ब ये कि हाईस्कूल के एक शिक्षक महोदय ने उसकी ट्यूशन शुरू भी कर दी थी.
           एक दिन मेरे सिर में दर्द था. मैंने सोचा क्लास में कहला दूं कि बच्चे अपना रिविजन करे, कल टेस्ट लूँगा. फिर मधु को देखे बिना मन नहीं माना तो खुद जाकर कह आया. लैब में आकर बैठ गया. 

मैं सर थामे आँखें बंद किये बैठा था कि एक आवाज सी हुई, कोई टेबल के पास खड़ा था.  

देखा तो मधु थी. उसके खुली हथेली पर एक कॉम्बीफ्लाम की टेबलेट थी. “कहाँ से लाई?” पूछा. “पास में रखती हूँ. कभी कभी जरूरत पड़ती है.” कहा और चली गयी. 
           चपरासी को बुला कर पानी मंगवाया, टेबलेट निगली, पर दर्द तो जैसे टेबलेट पाते ही गायब हो गया था. 

इंटरवल में वह फिर आयी –“अब दर्द कैसा है सर?” 
           “ठीक है. टेबलेट के लिए धन्यवाद. पर आपको बार – बार मेरे पास नहीं आना चाहिए. किसी ने नोटिस किया तो?” सोचा कैसे कहूं? सर का दर्द तो ठीक हो गया पर दिल का दर्द तो बढ़ता जा रहा है.
           “लाइए आपका सर दबा दूं सर!”
           मैं पूरी तरह परास्त हो चुका था. मुझे खुद को संयत करने के लिए बहुत श्रम करना पड़ा. “मधु! अपने पापा से कह दीजिये मैं आपको ट्यूशन पढ़ाने को तैयार हूँ.”
           पहले तो जैसे वह सहम उठी, पर अचानक उत्साह दिखाते हुये बोली – “सच सर? आप हमें पढ़ाएंगे? थैंक यू सर!” और तेजी से चली गयी. 

मुझे आश्चर्य हुआ – “वह फक्क क्यों पड़ गयी थी?”
           दरअसल अब यह इतना आसान नहीं था. मैं नहीं समझ सका, पर वह समझती थी. पहले तो एक पढ़ाते ट्यूटर को हटा कर मुझे लगाना ही मुश्किल था. क्या कारण बताती? फिर अपने पापा को कन्विंस करना! पर उसने किया..!

 फिर भी जब मैं पहले दिन उसके घर पढ़ाने पहुंचा तो उसके पापा का ठंढा बर्ताव एक अजीब तनाव की तरह लगा. जो अध्यापक उसे पढ़ा रहे थे, वे भी खासे नाराज थे. 

बाद में उनकी नाराजगी भारी भी पडी..;



Monday, May 21, 2018

"किसी का नाम लो जिसको, मोहब्बत रास आई हो.!" भाग:- 2


किसी का नाम लो जिसको.....

[ भाग - 2 ]

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वह इसी बात को लेकर पहली बार आयी थी..;

           मैं खाली पीरियड्स में हमेशा लैब में बैठता था, लेकिन जब सिगरेट की तलब लगती तो स्टाफ रूम में आ जाता था. मैं स्टाफ रूम में सिगरेट के कश ले रहा था, कि उसने चिक उठा कर बड़ी अदा से कहा – 

‘मे आई कम इन सर?”

           मैंने जल्दी से सिगरेट जूतों तले मसला और सर हिला कर अन्दर आने को कहा. वह अपनी नोटबुक मेरे सामने रख कर खड़ी हो गयी. मैं कुछ समझा नहीं. पूछा – ‘क्या बात है?”

           कॉपी देख लीजिये सर!

           मैंने उलट पुलट कर देखा, आख़िरी टास्क तक कम्पलीट भी था और चेक्ड भी. मैं हैरत से बोला – “चेक्ड तो है!”

           “बात ये है सर, कि हम इतनी मेहनत से आपका दिया वर्क कर के लाते हैं, आपने कभी रिमार्क में फेयर तक नहीं दिया. बाकी सब्जेक्ट्स में हम अक्सर गुड या वैरी गुड पाते हैं. क्या हम बायोलॉजी में कमजोर हैं सर?”

           सच में उसकी नोटबुक बहुत अच्छी थी, 

स्केच भी बहुत साफ़-सुन्दर बने थे. एन्करेज्मेंट देना चाहिए था, पर मैं अपनी इमेज तोड़ने के पक्ष में नहीं था. 

आखिर इसकी इतनी हिम्मत हुई कैसे? 

मैंने अच्छी खासी डांट पिला दी. 

“क्या समझतीं हैं आप खुद को? हिन्दी नहीं है ये, बायोलॉजी है. इस तरह.....!” 

तभी एक और अध्यापक आ गए, मैंने और जोर से डांटना शुरू कर दिया. सुनती रही, और सर झुकाए चली गयी.

           उन अध्यापक महोदय ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं भांग खा गया होऊं. 

वो अंगरेजी पढ़ाते थे. उन्होंने काफी तारीफ़ की मधु की. उन्ही से पता चला कि पी डब्ल्यू डी के किसी बड़े अधिकारी की बेटी थी मधु. शहर में ख़ासा रूतबा था उनका. बड़ा सा बँगला था सरकारी. सरकारी गाडी मिली थी. शरीफ भी थे खासे. और पैसे वाले तो थे ही. 

लडकी भी जहीन थी, मेहनती थी. मुझे अफ़सोस हुआ. लगा कि डांटना नहीं चाहिए था.
           

शाम को उसके पापा की सरकारी जीप मेरे क्वार्टर के सामने रुकी. मैं अकेला रहता था. 

गर्मजोशी से स्वागत किया, पर मैं स्टोव जला कर चाय बनाने चला तो उन्होंने मना कर दिया. आस पड़ोस से कुछ लोग आ गए थे, सो पड़ोस से चाय नाश्ता आ गया. पर मैं भीतर ही भीतर डर रहा था. सुबह इनकी लडकी को डांट दिया, रुतबे वाला शख्श है, जाने क्या करे? देखा कमर में रिवाल्वर जैसा कुछ लटक रहा था, या शायद पिस्टल था. पर उन्होंने इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा. चाय निपटी तो बोले – 

“सर! मैं लडकी को मेडिकल में डालना चाहता हूँ. उसे लगता है कि उसे ट्यूशन की जरूरत है. आपकी बहुत तारीफ़ करती है, तो सोचा कि आपसे ही कहूं. प्लीज आप उसे कुछ वक़्त दे दें. उसकी ज़िंदगी सुधर जायेगी”.

           मैंने बहुत नम्रता पूर्वक घुमा फिरा कर असमर्थता व्यक्त कर दी. 

और मैंने यह भी कहा कि उसे ट्यूशन की कतई जरूरत नहीं है, मैं उसे पढाता हूँ, सो जानता हूँ, वह अपने दम पर अच्छा कर सकती है. 

वे कुछ ज्यादा ही आग्रह करने लगे तो मैंने साफ़ कह दिया – “देखिये, मैं प्राइवेट ट्यूशन तो नहीं करूंगा. पर उसे कोई समस्या हो तो खाली  पीरियड्स में मुझसे हेल्प ले सकती है”. 

वे निराश हो कर चले गये.
           दूसरे दिन मैंने क्लास में देखा वह सिर झुकाए बैठी थी. शायद नाराज थी, या शायद दुखी थी. मैंने उसके पिता की बात नहीं मानी थी. वो मुझसे कुछ भयभीत भी लग रही थी, कि शायद मैं फिर डांट दूंगा.

 मेरा मन भी पढ़ाने में नहीं लग रहा था. मुझे लग रहा था कि इस अच्छी सी लडकी का मन दुख गया है, और मेरी वजह से दुःख गया है. मैंने लेक्चर बीच में छोड़ दिया और कुछ मौखिक टेस्ट लेने लगा. 


उसका सिर नीचे का नीचे था.
           कुछ सवाल मैंने इधर उधर फेंके और फिर एक मुश्किल सा सवाल बोल कर तपाक से उसका नाम ले लिया. उसे पता ही न चला. 

बगल वाली लडकी ने कुहनी से टहोका तो उठ कर खड़ी हो गयी. मैंने सवाल दुहराया. 

वह कुछ देर तक सिर झुकाये खड़ी रही, फिर उदास स्वर में बोली – “नहीं पता सर!’ 

अब मैं चौंका.! मुझे पूरा विश्वास था कि उसे आता है. 

पर जाने क्या था, मैं झल्ला गया. मैंने कहा – “तो फिर आप खड़ी रहिये!” और वह पूरे टाइम खड़ी रही.
           

अब मैंने रोज आख़िरी पंद्रह मिनट क्लास में सवाल पूछने शुरू किये. रोज उससे भी कोई सवाल जरूर पूछता. उसने कभी जवाब नहीं दिया. 

सरल से सरल प्रश्न पूछ कर देखा, पर साहब अजीब जिद थी उसकी. कभी जवाब नहीं देती थी. 

मुझे लग गया कि उसने ठान लिया है कि किसी सवाल का जवाब नहीं देगी. पर क्यों..? 

मुझमें भी जिद भरती गयी. 

रोज का तमाशा हो गया....;




भाग :- 3

"किसी का नाम लो जिसको, मोहब्बत रास आई हो.!" भाग :- 1

किसी का नाम लो जिसको... 

[ भाग-1 ]

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           “फैन हूँ आपका. आप जानते ही हैं. पर एक शर्त है सर! इसे फेसबुक पर पोस्ट जरूर करिये लेकिन कृपया नाम बदल दें. 

वो क्या है, कि आप ही का शेर है...,

           देखेगा जो मुझे तुझे पहचान जाएगा, 

           आँखों में तेरा अक्स है ठहरा हुआ अभी...!

तो दोनों की बदनामी होगी. मेरा क्या है? पर शायद उसकी एक भरी पूरी दुनिया हो!”.

           “अवश्य. मुझे तो बस एक कहानी चाहिये. नाम असली देकर मुझे किसी को रुसवा नहीं करना. आपकी शर्त मंजूर”. मुझे लगा कि वह व्यक्ति एक पीर का ऐसा भरा बादल है जो कहीं बरस न सका और बरसना तो चाह रहा है किन्तु शायद ऐसी भूमि में जहां बरसना बेकार न जाये.

           सिगरेट से मुझे एलर्जी है, पर वे बिना सिगरेट के शायद शुरू नहीं कर पाते, तो मैंने किसी तरह बर्दाश्त किया. धुँआ एक गोल छल्ला बनाता उठ रहा था और मैंने इस अदा से छल्ले बनाने वाला बहुत दिनों बाद देखा था. मैं सोच रहा था – चलो कोशिश करते है. आज कल फेसबुक पर बहुत प्रेम कहानियाँ आ रहीं हैं. शायद मेरी छौंक - बघार से कोई अच्छी कहानी मिल जाए लोगों को. पार्क में अब सन्नाटा पसरने लगा था. काफी देर तक चुप्पी रही. लगा कि शायद आज का दिन बेकार जाएगा, पर नहीं, गला साफ़ कर वे जैसे – तैसे शुरू हुये.

           “देखिये, जिसे आज कल जिसे लोग प्यार कहते हैं वो उठती उम्र की एक ललक भर है. कहानियों, उपन्यासों को पढ़ कर, फिल्मों आदि को देख कर जी में उठता है कि कोई होना चाहिए. बस सबकी नज़र बचा कर पेंगें मारने में मज़ा आता है. पर जाहिर होने पर जो बे-भाव की पड़ती है, तो भूत उतर जाता है” – वे शुरू हो चुके थे.

           “मुझ पर भी सवार हो गया खब्त, पर जान-बूझ कर नहीं, अनजाने में. एक डोर थी जो खींचती चली गयी, और जब वह डोर टूटी तो मैं एक कटे पतंग की तरह था, जिसका आसमान उसे अपनाने से इनकार कर चुका था. उन दिनों मैं एक इंटर कॉलेज में बायोलॉजी का लेक्चरर था, नई पोस्टिंग थी. नया नया एम एस सी कर के निकला था, दो चार जगह आवेदन किया और वहाँ सेलेक्ट हो गया. कॉलेज की आदतें अभी बरकरार थीं. अदा से पढाता था, मेहनत से भी. साथ के अध्यापक पीठ पीछे आलोचना करते लेकिन मुझे परवाह नहीं थी. 

           हर क्लास में आठ – दस लड़कियाँ थी. फर्स्ट इअर में शायद बारह थीं, जिनमें चार को आकर्षक कहा जा सकता था. लेकिन एक तो बस तोहफा थी. चूंकि कॉलेज में कोई एम एस सी किया बायोलॉजी का टीचर न था तो जियोलॉजी और बोटनी दोनों की क्लास मुझे ही लेनी पड़ती थी, सो मैं वैसे भी एक महत्वपूर्ण हैसियत रखता था. और रिजर्व्ड भी रहता था. सो इम्प्रेशन अच्छा था. क्लास में मेरे घुसते ही सन्नाटा छा जाता था. सभी मुझे ध्यान से सुनते थे. नोट्स लिखवाता तो क्लास में कापियों के खुलने और कलम के चलने की सरसराहट फ़ैल जाती, और सभी बहुत ध्यान से सुन कर लिखते क्यों कि मुझे दुहराने की आदत नहीं थी. पांच मिनट पहले क्लास छोड़ देता था.

           स्टूडेंट्स मेरे प्रति कितने आकर्षित थे, यह उनकी नोटबुक से पता चल जाता था. सुन्दर कवर लगी कापियां जिन पर रंग बिरंगे अखबारी या पत्रिकाओं के पन्नों के कवर. ड्राइंग साफ़ सलीके से बनी हुई. हेडिगों में रंगीन स्याही का इस्तेमाल. पर नोट्स कितने भी मन से लिखे जांय मैं कभी फेयर या गुड जैसे रिमार्क्स नहीं देता था.

    "वह इसी बात को लेकर पहली बार आयी थी."



भाग:- 2